Sunday, 23 July 2017

रतना रायका का इतिहास भाग 9

जय बाबै री सा 

रतना रायका का इतिहास भाग 9


यह सब सुनकर सुगना उठकर बाग में भाई रामदेव जी के पास पहुंची और गले लगा कर रोती आंसू टपकाती मिली। तब रामदेव जी ने कहा बाई रोती क्यो हैं? आज पुंगलगढ़ के पड़िहारो का नामो निशान हमेशा के लिए मिटा रहा हूँ। कामडियो भक्तो का तम्बूरीयो की ताल सुनकर मज़ा देख ले। यह सुनकर सुगना ने कहा भाई। अब इनके सभी अपराधों को क्षमा कर दो भाई। अब इनके कलंक रह जाएगा। अपने सुहाग की भीख मांगकर कहती हूँ कि खोटी करनी का फल सबको मिल गया रामदेव जी ने कहा बहिन पहले तो तू तुंवरो को कोस रही थी। जो तुम्हारी इच्छा है , लड़ाई बंद करता हूँ। कह कर विजय सूचक पंचानन की ध्वनि करके हनुमान तथा दुर्गे माता आदि सब देव सेना को विदाई दी इतने में पांच पुत्रों को लेकर सुगना की सास भी आकर रामदेव जी के चरणों में दंडवत प्रणाम करके क्षमा मांग के फूट फूट कर रोने विलाप करने लगे और कहने लगे। हमारी गलती माफ करो आपका परिचय हम सबको मिल गया रतना को हमने परखने के लिए काल कोठड़ी में बंद कर दिया है सो आप निकलवा दो। हमें क्षमा करके प्राणदान दे दो।

खटके ताला टुटीया।
जटके पडिया जंजीर।।
रतनो हाजर हो गयो।
थाने रगं हो रामापीर।।

रतना बारंबार रामदेव जी के चरणों में गिरकर प्रणाम करता बहुत विनती करने लगा।

सुगना बाई के पति ईशन सिंह जी अपने बड़े भाई विजय सिंह के सहित प्रार्थना करके रामदेव जी से कहने लगे आप पधारो आपकी बहन को हम जल्दी ही रतना के साथ रवाना कर रहे हैं यह सुनकर रामदेव जी अपनी योग कला द्वारा लौटकर पोकरण गढ़ पहुंचे और माता पिता को समाचार दिए सुगना आ रही है यह सुनकर  सबको बड़ी प्रसन्नता हुई यह सारा कार्य तीन घंटे के बाद एक पहर में संपन्न हुआ।

 उधर पड़िहारो के परिवार ने सास सहित मिलकर सुगना को पोकरण जाने के लिए विदाई दी तब गांव से बाहर पहुचने आई और शकुन देखे तो दाहिने तीतर,  बायें गधा भौंका इत्यादि अपशकुनों को देखकर सास ने कहां बहू! पुत्र को साथ मत ले जा, घर पर तुम्हारे देवर का लग्न है बालक अभी पांच वर्ष का छोटा है रास्ते में भूख प्यास तकलीफों को वो सहन नहीं कर सकेगा। अगर बालक को कुछ हुआ तो तुझे पुंगलगढ़ में जगह नही मिलेगी। भारी जाती हैं खाली आवेगी। इसलिए पुत्र को यही छोड़ दो। यह सुनकर सुगना ने वात्सल्य भाव को प्रकट करते हुए कहा। भगवत कृपा से मेरा भाई बड़ा सिद्ध चमत्कारी है मुझे सकून क्या बिगाड़ेंगे। तब हठ देखकर सांस ने जलती बलती सुनाकर घर का रास्ता लिया।

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Saturday, 22 July 2017

रतना रायका का इतिहास भाग 8

रतना रायका इतिहास भाग 8

जय बाबै री सा

 चौसठ जोगणियों और बावन भैरवों ने रक्त खप्पर खोपड़ियों की ताल बजाकर घमासान तांडवमय युद्ध करने लगे तो रामदेव जी ने भी बीच-बीच में अपने बाण चला चला कर पड़िहारों में भगदड़ मचा दी तब विजय सिंह अपने चारो भाइयों को लेकर माता की शरण में आ गए और कहां मां हमको बचाओ?

 हमारी सब फौज मारी गई इत्यादि विलाप को सुनकर ढाढस बंधाते हुए माता ने एक अंधेरी कोठरी में पांच भाइयों को बंद कर के दरवाजे पर शीला सरका दी। अंधेरी कोठरी में भी देव माया से हजारों बिच्छुओं ने डंक मारे जिससे पांचों पडियार चिल्लाने लगे। हाय हमें कोई बचाओ ?

अपने पुत्रों की दीन दशा देखकर माता दौड़ती हुई आई सुगना के पास पहुंची और कहने लगी बहू तुम्हारे पैरो में पड़ती हूं,  अपने भाई को समझाओ तो लड़ाई बंद करे मैं मेरे पांचों कुमार पड़िहारो का जीवन दान मांगती हूँ।  हमारे सब अपराधों को क्षमा कर दो, नहीं तो पुंगलगढ़ का उजाड़ हो जाएगा। यह कह कर  सुगना ने कहा।

 आप सब कहते थे, कामड़ो की बेटी के क्या करेगी? तुंवर तो तम्बुरिये हैं, अब वह वीरता रजपूती कहाँ गयी। मेरे अकेले भाई पर सारी फ़ौजों का रिसाला व तोपखाना चढ़ाया गया। लड़ो तम्बुरिये कामड़ो से, मारू राग गावो इन प्रकार स्त्री स्वभाव को प्रकट करते सुन कर सास कहने लगी देवी बहू! क्षमा करो सब भूलों को, यह बातों का समय नही  हैं।

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रतना रायका का इतिहास भाग 7

जय बाबै री सा

रतना रायका का इतिहास भाग 7

इत्यादि समाचारों के साथ तानो की पुट भ्रमार सुनकर सुगना बाई की छाती धक धक करने लगी। सिर चकराने लगा। और खाना पीना छोड़ चिंता में सब श्रृंगार भूल गई। एकांत में बैठकर ईश्वर से पुकार करके विनय करने लगी।

भक्त प्रह्लाद के संकट टारेजु, ध्रुव को अविचल राज दिलायो।
सो गजराज उद्धार दियो तब और हूँ भक्त महा सुख पायो।
भारत युद्ध मे अँड उभारजु, द्रोपदी लॉज को आप बचायो।
संकट में अब प्राण तंजूखल, मो बिरियां जबहु नहिं आयो।
इस अवसर पर हे प्रभु। जो नहिं आये आप।
प्राण तजु हरि को भजु, लगे आपको पाप।
तो बिन दूजा साँवरा, नही मोरे आधार।
शरण पड़ी लज्जा रखो, दुख के भंजनहार।

 इत्यादि नाना विलाप करके आर्त नाद से पुकार रही थी, दूसरी तरह रतना काल कोठड़ी में बंद ईश्वर को पुकार रहा था।

धुप ने धुपाण बाई लिया हाथा मे,चढ़िया झरोखा माई।।
झरोखे चढ़ी ने बाई हेलो परो राल्यो, सुणजो राम भाई।।
बडा विरम देव छोटा धणी रामदेव द्वारका रा नाथ केवाई।।
आप तो नी आया वीरा रतना ने मेलियो लिले असवार होई।।
रतना राईका री वार चढ़े वेगा आई।।


पराया री पीड़ धणी पल में आवो
म्हारी वेला इतरी काई देर लगावो।।

 उस तरफ कल्पना सिद्ध रामदेवजी ने देश काल को विचार कर देखा पड़िहार हठी है कही सुगना को न भेजेंगे तो रतना हठ कर लेगा तब इसको भी कष्ट ना दे।

इत्यादि चिंतन करके आध्यात्मिक सिद्धि से अनन्य स्वरूप से तुरंत पवन गुटके सिद्धि से पुंगलगढ़ जाकर सूक्ष्म आत्म शक्ति से सब लीला चरित्र देखकर ज्ञात किया कि वास्तव में रतना और सुगना पर विपत्ति बीत रही है। तब तो राजसी वीर भेष में घोड़े सहित विजय सिंह राजा के सूखे बाग में डेरा लगाने की इच्छा से जैसे ही बाग में बाबा रामदेव जी पहुंचे कि सारा बाग फल फूलों से लहरा उठा, बगीचा सुहावना सुंदर हो गया माली ने फूलों का हार बनाकर रंग-बिरंगे मन के भावों की भांति सुशोभित सुगंध पल्लव सहित कुसुम विजय सिंह को भेट दिए।

 जिसको देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ तब राजा ने माली से पूछा- बागबान जी। बाग तो सूखा था तो फूलों का हार कहां से लाए हो?  माली ने उत्तर दिया एक रामदेव जी तुंवर सरदार बाग में आये और बाग हरा-भरा हो गया बड़ा सुंदर स्वरूप है, वीर वेश प्रेम पांचो शस्त्र ढाल, तलवार बंदूक धनुष बाण और कटार सजे लीलुडा घोड़ा हैं। बाग के प्रत्येक वृक्ष की डाली से वीणा की गुंजार तथा पत्ते पत्ते से मंजिरे, झांझ की झनकार पड़ती व्याप्य वशित्व सिद्धि दिखाई देती हैं।

 विजय सिंह के दरबार में यह समाचार सुनते ही पड़िहारो ने कहा कामड़िया भजनी आ गया है तो सिखाओ वीरता के गीत और चढ़ाओ तोप खाना मोर्चे पर, बगीचे को घेरा देकर बंद करो, जिससे कई भाग ना जाए, किले के दरवाजे बंद कर दो और नगर में ढिंढोरा देकर कहला दो कि कोई भी खिड़की फाटक खुला ना छोड़े।

इधर रामदेव जी ने कहा कि परिहारों ने युद्ध की तैयारी कर ली है शास्त्रो को सजाये जा रहे हैं तब अपने पंचानन शंख को बजाया और देव सिद्धि से सब देवताओं ने किले के चारों तरफ घेरा दे दिया। जिससे पडियारो को देवमाया से चारो तरफ सेना दिख पड़ने लगी। रामदेव जी की ललकार के साथ हनुमान जी ने गदा और लंगूर को घुमाकर कोट के कंगरे और वीर को फटकार के साथ पटकना मारना आरंभ किया। दुर्गे ने अष्ट भुजा वीर शस्त्र वक्र गदा तलवार ढाल, फरसा, पांश,अंकुश से बैरियों को मारना आरम्भ किया।

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रतना रायका का इतिहास भाग 6

जय बाबै री सा

रतना रायका का इतिहास भाग 6

पुष्टि करते हुए अन्य सभासद बोले हां भाई दो गांव के मालिक तुंवर भी भगवान के अवतार और सिद्ध है देखें  इनकी अकल पुरुषार्थ को।

 विजयसिंह बोले यह अजमलजी कि चाल है केवल हमें नीचा दिखाने को निमंत्रण भेजा है सच्चा प्रेम होता तो बाई को मौके पर पहले ही बुलवा लेते। यहां से 15 दिन का रास्ता है इसलिए रतना तू वापस चला जा।

इस प्रकार के अभिमान भरे अस्त-व्यस्त व्यंग शब्द चुनकर रतना का क्रोध भड़क उठा तब कड़क कर कहने लगा महाराज। आप अपने राज्य मद में छक रहे हैं। मुढ बुद्धि विवेकहीन तथा तुच्छता प्रमादवश जो कुछ कहते हो वह सब झूठ बकवास है।  आपको मालूम नहीं है रामदेव जी, भक्तों की सहायता के लिए हर समय तैयार है, आप सुगना बाई को भेज दो इसमें आप सबकी भलाई है तथा भली इज्जत रह जाएगी नहीं तो इस झगड़े को मोल मत लो फिर वज्र के चने चबाना कठिन हो जाएंगे।

यह सुनकर विजय सिंह का खून खौल उठा और क्रोधाग्नि में होंठ फड़कने लगे, आंख लाल करके अपने चाकरों को आज्ञा देते हुए बोले इस रायका को काल कोठड़ी में डाल दो और ऊंट को पायगो में बांध दो।

 (मैं इस बात की पुष्टि नही करता हूँ की रतना रायका को काल कोठड़ी में डाला था या कुंए में औंधे मुंह लटकाया था।  क्योंकि कुछ लोग बताते हैं कि रतना को काल कोठड़ी में डाल दिया था पर देसी भजनों के माध्यम से सुनने में आता है कि रतना को कुंए में औंधे मुंह लटका दिया जाता हैं।)

अब इस भक्त की सहायता करने कब कामड़ देव रामदेव आते हैं। आज्ञा होते सब कुछ पालना कर दी गई।

 रणवास में सुगना बाई की ननद को मालूम हुआ तो सुगना के पास जाकर वह सदैव की भांति ताने का व्यंग कस कर पूरे समाचार चुनाते हुए वह बोली भाभी। तेरे भाई रामदेव का विवाह है, तुझे बुलाने को कुंकुम पत्रिका लेकर एक रायका आया था। उसको मेरे भाई ने काल कोठड़ी में बंद कर दिया।

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Sunday, 9 July 2017

रतना रायका का इतिहास भाग 5

जय बाबै री सा 

रतना रायका का इतिहास भाग 5

यह सब सुनकर विजय सिंह ने अपने सरदारों के सामने देखकर हंसते हुए एक व्यंग कसा

 तम्बुरिये भक्त तुंवरो में भगवान के बाप का निमंत्रण आ गया हैं।नीच ऊंच की मर्यादा छोड़ सायर मेघवाल के घर आना जाना और उनकी छोकरियां (डाली बाई) घर का काम करें तो कहां रही रजपूती। रणसिंहजी भी घर घर तंबूरा खड़काते और उनका बेटा अजमल तो कहीं दिन तक भक्त बना द्वारकाधीश की यात्रा करता रहा अब उनका पौता सिद्ध बाबा कहलाता है। यह तो इनकी खानदानी आदत है। यदि सुगना पीहर आती जाती रहती तो आज तक पिछले बीस वर्षों में पुंगलगढ़ में भी तम्बुरिये घुस जाते"  एक अन्य सरदार ने पुष्टि करते हुए कहा अजमलजी के दो कुंवर है छोटा कुंवर तो कामड़ो जैसा गाने बजाने वाला के साथ घूमता रहता है और बड़ा ही सिद्ध बना रहता है एक अन्य सभासद बोला पुंगलगढ़ से पोकरण कितना दूर है ? कितने दिनों का रास्ता हैं ? इस पर तो तुंवरो ने विचार नहीं किया ? लगन के बाकी छ:दिन है और अब बुलावा भेजा ताकि समय पर कोई पहुंच ना सके और बुलाने का बहाना भी सध जाय।

यह सुनकर अन्य सभासदों ने कहा- सुना है अमरकोट के दलराज सोढा की अंधी पंगुली एवम अष्टवक्री कन्या है जो कही किसी के वरण न करने पर तुंवरो के गले बांध दी है।


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रतना रायका का इतिहास भाग 4

जय बाबै री सा

रतना रायका का इतिहास भाग 4


रतना ने कहा महाराज! मैं तो चला जाऊंगा परंतु यहां से पुंगलगढ़ बहुत दूर है, रास्ता भी विकट चोर डाकुओ से घिरा खतरनाक है और एक महीने का आवागमन मार्ग हैं। उधर विवाह के बाकी सात दिन ही तो है और पड़िहार बड़े बांकेे झगड़ालू है। यह सुनकर रामदेव जी ने कहा रतना बाकी तुझे कुछ नही सोचना है, केवल अभी तुझे चले जाना है आगे जब संकट पड़े मैं तेरे साथ हूं तू मुझे आवाज़ लगा देना और वहां चतुराई एवं विवेक बुद्धि से नीति का काम लेना।

जिस प्रकार राम जी का आदेश पाकर हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने लंका जाते हैं।
उसी तरह रतना रायका बाबा रामदेव जी का आदेश लेकर बाई सुगना को लेने पुंगलगढ़ जाता हैं

रामदेवजी के कहे परमाण को सत्य विश्वास से पूर्ण मानकर रतना ऊंट पर पलाव (पलाण) कस कर गवरी पुत्र गणेश का ध्यान करके ऊंट पर सवार हुआ और पुंगलगढ़ को रवाना हो गया। बहुत सी मंजिल पार करके दूर पहुंचने पर थक गया। विश्राम किया, नींद आ गई। नींद से जागकर देखा कि सामने गांव दिख रहा है। पुनः ऊंट पर सवार होकर चला, आगे ही कुएं  *पनिहारियां* थी उनसे पूछने पर ज्ञात हुआ कि यही पुंगलगढ़ है। पनिहारियों ने पूछा "भाई कहां से आए हो कहां जाना है? रतना ने उत्तर देते हुए कहां-मैं पोकरण से रामदेवजी की विवाह की कुमकुम पत्रिका लेकर पड़िहारों को देने आया हूं और जाता सुगना बाई को लेता जाऊंगा"।  पनिहारियों ने कहां "यात्री भाई! पड़िहार बांके है, तू यदि अपना भला चाहे तो यही से वापस चला जा।"  रतना अपने विचारों में लीन होता आगे बढ़ता रहा।

पड़िहारो का सभा भवन सजा हुआ था रतना ने सभा भवन देखा-सुगना के ज्येष्ठ विजय सिंह सिंहासन पर बैठे हैं विविध प्रकार के उपकरणों से दरबार सजा हुआ है प्रहरी चंवर ढुला रहे हैं सेवक जल झारी, पंखा झूला रहे हैं। रतना ने जाकर सभा की मर्यादा निभाते हुए प्रणाम किया और जाजम पर बैठ गया। एक सभासद परिवार ने पूछा कौन हो?  कहां से आना हुआ और किस काम से आये ?  सुनकर रतना ने समाधान करते हुए बताया कि

गढ़ पोकरण सूं आयो, रामदेव जी रो संदेशो लायो।
रायका घर जन्म पायो, रतनो रायको नाम म्हारो।
मैं बाई सुगना ने लेवण ने आयो।।

 पोकरण से कुंवर रामदेव जी के विवाह की कुमकुम पत्रिका देने आया हूं, रतना रायका मेरा नाम है वापस जाता बाई सुगना को साथ लेता जाऊंगा।

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रतना रायका का इतिहास भाग 3

जय बाबै री सा 

रतना रायका का इतिहास भाग 3

 घर में विवाह के बाद लड़कियां कई बार पीहर आती है, जवाई सा लेने आते हैं, गीत राग बधाइयों से माता-पिता उनके साथ कन्या को भेजते हैं। परंतु मेरे भाग्य में ऐसा सुख लिखा ही नहीं। जो रामदेव और वीरम देव जैसे भाई होते हुए भी इस अवसर पर सुगना को नहीं ला सके तो फिर मेरे जीवन में उसका सुख देखना लिखा ही नहीं।

रामदेवजी ने सारा वृत्तांत सुना और अपनी पोशाक पहनकर माता से कहने लगे। "मां! मैं पुंगलगढ़ सुगना को लेने जा रहा हूं"  माता ने समझाया बेटा! हाथों में मेहंदी लगी है बाने बैठा हुआ मौली बंधा हुआ तुम घर के बाहर आ नहीं जा सकते सो गांव के बाहर पुंगलगढ़ तो दूर की बात है माता का कहना मानकर समझकर रामदेव जी ने अपने सखा रतना नामक रायका को बुलाया कहा-रतना! तुझे अभी ऊंट तैयार कर पुंगलगढ़ जाकर बाई सुगना को लाना है।

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रतना रायका का इतिहास भाग 2

जय बाबै री सा

रतना रायका इतिहास भाग 2

 माता मैणादे रामदेव जी के स्वभाव को जानती थी, उसने शांति से धीरज बंधाते हुए समझाकर कहा- बेटा! आपका अभी लगन चढ़ा समय है। आप घर से कहीं बाहर नही जा सकते हैं कर्म का लिखा कोई मिटा नही सकता। भाग्य का संयोग बड़ा विचित्र अमिट अक्षय हैं माता ने स्त्री स्वभाव के उपक्रम बनाते हुए कहना जारी रखा सुगना का बड़ा अच्छा घराना देखकर विवाह किया, परंतु ऐसी कभी आशा नहीं थी कि पडियार इतने हटी और निखट्टू निकलेंगे। जब से सुगना को विवाह करके पुंगलगढ़ भेजी है तब से मैंने उसका मुख नहीं देखा आज उसकी याद करके छाती में प्रेम उमड़ आया हैं।और प्रेमाश्रुओं से आंखें भर आई। शायद लाला आपके विवाह की पत्रिका भी पहुंची या नहीं कोई पता नहीं।

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रतना रायका का इतिहास भाग 1

जय बाबै री सा

श्री बाबा रामदेव जी का सखा भक्त रतना राईका एवं सुगना बाई का इतिहास

जैसे कृष्णा का मित्र सुदामा ।।
वैसे रामदेव जी का मित्र रतना रायका ।।
जैसे राम का भक्त हनुमान ।।
वैसे रामदेव जी का भक्त रतना रायका ।।
रतना रामदेव जी बचपन रा साथी।
एक थाली में मैणादे भोजन जिमाती ।।


रतना राईका का जन्म विक्रम संवत 1401 में चैत्र सुदी पूर्णिमा वार : मंगलवार के दिन जोधपुर जिले के (विकुकोर) बिक़मकोर गांव के नताजी राईका के घर राईका कुल में हुआ, माता का नाम उगा देवी था। रतनाजी के दादाजी का नाम - समल जी राईका था। जोधपुर से लगभग 80 किमी दूर है।  शुरवीर रतना राईका जो बाबा रामदेव जी के साथ पोकरणगढ़ के दरबार मे अजमलजी के साथ के मंच पर बैठे थे। अजमल जी को रतना रायका अतिप्रिय एवं विश्वासी थे। और दरबार में उनके पूछे बिना कोई भी फैसला नही होता था हर बात को लेकर अजमल जी व रामदेव जी रतना राईका से विचार विमर्श करते थे। जब रानी नेतलदे के विवाह का संदेश लेकर पुरोहित जी रामदेवरा पधारे और अजमल जी को रानी नेतलदे विवाह का संदेश व बाबा रामदेव जी से विवाह की बात रखी। अजमल जी ने रतना रायका से पूछा कि सच बात क्या हैं तब रतना ने कहां महाराज सुना है कि नेतलदे रुकमणी का अवतार हैं और आपके छोटे कुंवर सा रामदेव जी का नाम जपती रहती हैं। पगो से पुंगली हैं और आंखों से अंधी हैं। तभी रतना रायका से सच्चाई को जानकर अजमल जी ने दरबार मे रामदेव जी को बुलाया और रामदेव जी को नेतलदे के विवाह का संदेश सुनाया गया और रामदेव जी ने रानी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। और बाबा के विवाह का नारियल लिया गया एवं पुरोहित को अजमल जी ने बहुत सारी भेट देकर खुशी से विदा किया गया। बाबा रामदेव जी के विवाह की सम्पूर्ण तैयारियां चल रही थी। एवं कुल परिवार के पास दूर रहने वाले सब सम्बंधी आ गए परंतु धनरूपजी महाराज की कन्या सुगना बाई अब तक नहीं आई। और इधर बारात जाने में केवल सात दिन बाकी थे। लाच्छा बाई पहले ही आ चुकी थी घर का सारा काम लाच्छा बाई  और डाली बाई अपनी सखी सहेलियों के साथ मिलकर कर रही थी। उसी दिन संध्या को बाबा रामदेव जी की पीटी की रस्म हो रही थी तो माता मैणादे (मैनावती) को भी वात्सल्य भाव का निर्वाह करने पीटी करने में हाथ बंटाना पड़ा सहसा सुगना की याद आई और माता की आंखों में आंसू बहने लगे। एक दो आंसू की बूंदे रामदेव जी की पीठ टपक पड़ी तो लगते ही  रामदेव जी ने ऊपर देखा तो माता की आंखों में रोना देखकर रामदेव जी विस्मय पूरित आश्चर्य से पूछने लगे माता क्या बात है? क्या मेरे से कोई अपराध हुआ या किसी और ने कोई अपराध किया ? जल्दी बता दे, अभी उसे दंड दिया जाय।

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