जय बाबै री सा
रतना रायका का इतिहास भाग 7
इत्यादि समाचारों के साथ तानो की पुट भ्रमार सुनकर सुगना बाई की छाती धक धक करने लगी। सिर चकराने लगा। और खाना पीना छोड़ चिंता में सब श्रृंगार भूल गई। एकांत में बैठकर ईश्वर से पुकार करके विनय करने लगी।
भक्त प्रह्लाद के संकट टारेजु, ध्रुव को अविचल राज दिलायो।
सो गजराज उद्धार दियो तब और हूँ भक्त महा सुख पायो।
भारत युद्ध मे अँड उभारजु, द्रोपदी लॉज को आप बचायो।
संकट में अब प्राण तंजूखल, मो बिरियां जबहु नहिं आयो।
इस अवसर पर हे प्रभु। जो नहिं आये आप।
प्राण तजु हरि को भजु, लगे आपको पाप।
तो बिन दूजा साँवरा, नही मोरे आधार।
शरण पड़ी लज्जा रखो, दुख के भंजनहार।
इत्यादि नाना विलाप करके आर्त नाद से पुकार रही थी, दूसरी तरह रतना काल कोठड़ी में बंद ईश्वर को पुकार रहा था।
धुप ने धुपाण बाई लिया हाथा मे,चढ़िया झरोखा माई।।
झरोखे चढ़ी ने बाई हेलो परो राल्यो, सुणजो राम भाई।।
बडा विरम देव छोटा धणी रामदेव द्वारका रा नाथ केवाई।।
आप तो नी आया वीरा रतना ने मेलियो लिले असवार होई।।
रतना राईका री वार चढ़े वेगा आई।।
पराया री पीड़ धणी पल में आवो
म्हारी वेला इतरी काई देर लगावो।।
उस तरफ कल्पना सिद्ध रामदेवजी ने देश काल को विचार कर देखा पड़िहार हठी है कही सुगना को न भेजेंगे तो रतना हठ कर लेगा तब इसको भी कष्ट ना दे।
इत्यादि चिंतन करके आध्यात्मिक सिद्धि से अनन्य स्वरूप से तुरंत पवन गुटके सिद्धि से पुंगलगढ़ जाकर सूक्ष्म आत्म शक्ति से सब लीला चरित्र देखकर ज्ञात किया कि वास्तव में रतना और सुगना पर विपत्ति बीत रही है। तब तो राजसी वीर भेष में घोड़े सहित विजय सिंह राजा के सूखे बाग में डेरा लगाने की इच्छा से जैसे ही बाग में बाबा रामदेव जी पहुंचे कि सारा बाग फल फूलों से लहरा उठा, बगीचा सुहावना सुंदर हो गया माली ने फूलों का हार बनाकर रंग-बिरंगे मन के भावों की भांति सुशोभित सुगंध पल्लव सहित कुसुम विजय सिंह को भेट दिए।
जिसको देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ तब राजा ने माली से पूछा- बागबान जी। बाग तो सूखा था तो फूलों का हार कहां से लाए हो? माली ने उत्तर दिया एक रामदेव जी तुंवर सरदार बाग में आये और बाग हरा-भरा हो गया बड़ा सुंदर स्वरूप है, वीर वेश प्रेम पांचो शस्त्र ढाल, तलवार बंदूक धनुष बाण और कटार सजे लीलुडा घोड़ा हैं। बाग के प्रत्येक वृक्ष की डाली से वीणा की गुंजार तथा पत्ते पत्ते से मंजिरे, झांझ की झनकार पड़ती व्याप्य वशित्व सिद्धि दिखाई देती हैं।
विजय सिंह के दरबार में यह समाचार सुनते ही पड़िहारो ने कहा कामड़िया भजनी आ गया है तो सिखाओ वीरता के गीत और चढ़ाओ तोप खाना मोर्चे पर, बगीचे को घेरा देकर बंद करो, जिससे कई भाग ना जाए, किले के दरवाजे बंद कर दो और नगर में ढिंढोरा देकर कहला दो कि कोई भी खिड़की फाटक खुला ना छोड़े।
इधर रामदेव जी ने कहा कि परिहारों ने युद्ध की तैयारी कर ली है शास्त्रो को सजाये जा रहे हैं तब अपने पंचानन शंख को बजाया और देव सिद्धि से सब देवताओं ने किले के चारों तरफ घेरा दे दिया। जिससे पडियारो को देवमाया से चारो तरफ सेना दिख पड़ने लगी। रामदेव जी की ललकार के साथ हनुमान जी ने गदा और लंगूर को घुमाकर कोट के कंगरे और वीर को फटकार के साथ पटकना मारना आरंभ किया। दुर्गे ने अष्ट भुजा वीर शस्त्र वक्र गदा तलवार ढाल, फरसा, पांश,अंकुश से बैरियों को मारना आरम्भ किया।
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रतना रायका का इतिहास भाग 7
इत्यादि समाचारों के साथ तानो की पुट भ्रमार सुनकर सुगना बाई की छाती धक धक करने लगी। सिर चकराने लगा। और खाना पीना छोड़ चिंता में सब श्रृंगार भूल गई। एकांत में बैठकर ईश्वर से पुकार करके विनय करने लगी।
भक्त प्रह्लाद के संकट टारेजु, ध्रुव को अविचल राज दिलायो।
सो गजराज उद्धार दियो तब और हूँ भक्त महा सुख पायो।
भारत युद्ध मे अँड उभारजु, द्रोपदी लॉज को आप बचायो।
संकट में अब प्राण तंजूखल, मो बिरियां जबहु नहिं आयो।
इस अवसर पर हे प्रभु। जो नहिं आये आप।
प्राण तजु हरि को भजु, लगे आपको पाप।
तो बिन दूजा साँवरा, नही मोरे आधार।
शरण पड़ी लज्जा रखो, दुख के भंजनहार।
इत्यादि नाना विलाप करके आर्त नाद से पुकार रही थी, दूसरी तरह रतना काल कोठड़ी में बंद ईश्वर को पुकार रहा था।
धुप ने धुपाण बाई लिया हाथा मे,चढ़िया झरोखा माई।।
झरोखे चढ़ी ने बाई हेलो परो राल्यो, सुणजो राम भाई।।
बडा विरम देव छोटा धणी रामदेव द्वारका रा नाथ केवाई।।
आप तो नी आया वीरा रतना ने मेलियो लिले असवार होई।।
रतना राईका री वार चढ़े वेगा आई।।
पराया री पीड़ धणी पल में आवो
म्हारी वेला इतरी काई देर लगावो।।
उस तरफ कल्पना सिद्ध रामदेवजी ने देश काल को विचार कर देखा पड़िहार हठी है कही सुगना को न भेजेंगे तो रतना हठ कर लेगा तब इसको भी कष्ट ना दे।
इत्यादि चिंतन करके आध्यात्मिक सिद्धि से अनन्य स्वरूप से तुरंत पवन गुटके सिद्धि से पुंगलगढ़ जाकर सूक्ष्म आत्म शक्ति से सब लीला चरित्र देखकर ज्ञात किया कि वास्तव में रतना और सुगना पर विपत्ति बीत रही है। तब तो राजसी वीर भेष में घोड़े सहित विजय सिंह राजा के सूखे बाग में डेरा लगाने की इच्छा से जैसे ही बाग में बाबा रामदेव जी पहुंचे कि सारा बाग फल फूलों से लहरा उठा, बगीचा सुहावना सुंदर हो गया माली ने फूलों का हार बनाकर रंग-बिरंगे मन के भावों की भांति सुशोभित सुगंध पल्लव सहित कुसुम विजय सिंह को भेट दिए।
जिसको देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ तब राजा ने माली से पूछा- बागबान जी। बाग तो सूखा था तो फूलों का हार कहां से लाए हो? माली ने उत्तर दिया एक रामदेव जी तुंवर सरदार बाग में आये और बाग हरा-भरा हो गया बड़ा सुंदर स्वरूप है, वीर वेश प्रेम पांचो शस्त्र ढाल, तलवार बंदूक धनुष बाण और कटार सजे लीलुडा घोड़ा हैं। बाग के प्रत्येक वृक्ष की डाली से वीणा की गुंजार तथा पत्ते पत्ते से मंजिरे, झांझ की झनकार पड़ती व्याप्य वशित्व सिद्धि दिखाई देती हैं।
विजय सिंह के दरबार में यह समाचार सुनते ही पड़िहारो ने कहा कामड़िया भजनी आ गया है तो सिखाओ वीरता के गीत और चढ़ाओ तोप खाना मोर्चे पर, बगीचे को घेरा देकर बंद करो, जिससे कई भाग ना जाए, किले के दरवाजे बंद कर दो और नगर में ढिंढोरा देकर कहला दो कि कोई भी खिड़की फाटक खुला ना छोड़े।
इधर रामदेव जी ने कहा कि परिहारों ने युद्ध की तैयारी कर ली है शास्त्रो को सजाये जा रहे हैं तब अपने पंचानन शंख को बजाया और देव सिद्धि से सब देवताओं ने किले के चारों तरफ घेरा दे दिया। जिससे पडियारो को देवमाया से चारो तरफ सेना दिख पड़ने लगी। रामदेव जी की ललकार के साथ हनुमान जी ने गदा और लंगूर को घुमाकर कोट के कंगरे और वीर को फटकार के साथ पटकना मारना आरंभ किया। दुर्गे ने अष्ट भुजा वीर शस्त्र वक्र गदा तलवार ढाल, फरसा, पांश,अंकुश से बैरियों को मारना आरम्भ किया।
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